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यहां वरदान देती है यशोदा की पुत्री महामाया।


जिसने इस नगर को बसाया था। यहां शंकराचार्य का बनवाया हुआ मन्दिर भी है, जिसे शंकर मठ कहा जाता है। यहीं पर भगवान शंकराचार्य को भगवती दुर्गा ने दर्शन दिए और यहीं पर शंकराचार्य जी ने क्षमापराध स्तोत्र का प्रणयन किया था। वर्तमान में यह नगर शिक्षा का हब माना जाता है ।यहां सरकारी विद्यालयों के अलावा कई प्राइवेट विद्यालय हैं ,विश्वविद्यालय है ,जो छात्रों को शिक्षित ही नहीं बना रहे हैं वरन उन्हें सफलता के उच्च शिखर पर पहुंचा रहे हैं ।बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित यह नगर धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है । सर्वधर्म समभाव की भावना को जीवन में उतारते हुए यह नगर समस्त भारत के तीर्थ यात्रियों को अपने सौंदर्य से मोहित ही नहीं करता वरन् धार्मिक सौहार्द को भी बढ़ावा देता है ।यहां के गोला बाजार का सौंदर्य अवर्णनीय है। गोलाई में स्थित यह बाजार तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र है। गोला बाजार से 500 मीटर की दूरी पर भगवती कंसमर्दिनी का मंदिर है, जो पहाड़ी शैली पर बनाया गया है। इस देवी को भगवान कृष्ण की बहन माना जाता है। जिसका जन्म यशोदा माता के गर्भ से हुआ था और जिसने भगवान कृष्ण के स्थान पर अपना बलिदान दे दिया था। यह बात अलग है कि कंस महामाया को नहीं मार पाया और वह चतुर्भुजा देवी के रूप में भारतवर्ष में पूजी जाने लगी ।कहा जाता है कि महामाया कंस को आकाशवाणी के द्वारा सूचित करने पर इस स्थान पर आई और धनाई जाति के एक किसान को पुकार कर बोली कि मैं नवजात शिशु के रूप में यहां पर हूं मुझे वस्त्र दो और मेरा यहां पर मंदिर बनाओ। इस वाणी को सुनकर उसने जब उस स्थान पर देखा तो वहां पत्थर की ओट में एक नवजात बालिका पड़ी हुई थी। उसने अपने सिर के वस्त्र से उसे ढका और पुजारियों को बुला कर ले आया। सब ने मिलकर यहां पर मंदिर की स्थापना की और उसमें देवी की प्राण प्रतिष्ठा की ।यह देवी कंस मर्दिनी के नाम से जानी जाती है । आज भी बालिका के रूप में ही उसका पूजन होता है और पुजारी भी उसे अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर ही उसको नहलाता और उसका पूजन करता है ।डोली के अंदर रखी हुई इस देवी को कोई नहीं देखता ।अपनी श्रद्धा की भेंट बाहर से ही देवी को चढ़ा दी जाती है । कंस मर्दिनी धनाई और घिल्डियालों की कुलदेवी है ।चैत्र मास के नवरात्रों में और आश्विन मास के नवरात्रों में यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है। कंसमर्दनी को नगर की देवी भी माना गया है । सबकी इच्छाओं को पूरी करने वाली यह देवी नगर में और नगर से बाहर सभी स्थानों पर समान रूप से पूजित है । वर्तमान में देवी का भव्य मंदिर बनवाया जा रहा है। पुजारी स्व0 मुरलीधर घिल्डियाल जी ने मृत्यु से पूर्व बताया था कि कंस को कृष्ण के जन्म की सूचना देने के बाद महामाया यहां पर कुछ क्षणों के लिए रुकी और तत्पश्चात आकाश मार्ग से विंध्याचल की ओर चली गई और वहां विंध्यवासिनी के रूप में स्थापित हो गई। कुछ क्षणों की ही शक्ति यहां पर कंसमर्दिनी के रूप में पूजनीय है । मंदिर का मुख्य द्वार बहुत छोटा है ।उसमें एक बार में एक व्यक्ति ही सिर झुका कर भीतर प्रवेश कर सकता है। मंदिर के गर्भ गृह में दो से चार व्यक्तियों के बैठने की ही जगह है। ऐसा संभवतः शोरगुल से बचने और पवित्रता बनाए रखने के लिए किया गया होगा। दुर्गा सप्तशती में भी देवी ने अपने अवतारों का वर्णन करते हुए कहा है कि मैं यशोदा के गर्भ से जन्म लेकर भक्तों की इच्छाओं को पूरा करूंगी। निश्चित ही माता ने अपनी वाणी को पूरा किया और श्रीनगर में कंस मर्दिनी के रूप में स्थापित हुई ।अलकनंदा से लगभग 200 मीटर ऊपर की ओर स्थित यह मंदिर अत्यन्त प्राचीन ,भव्य और पवित्र है । वर्तमान में इस मंदिर को विशाल रूप देने की योजना पर कार्य हो रहा है। जिसके अनुसार इसका शिलान्यास 15 जनवरी 2020 को हुआ ।शहर के सभी गणमान्य लोगऔर जनप्रतिनिधि इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। सबने इस मंदिर को भव्य और विशाल रूप दिए जाने का स्वागत किया है ।मंदिर समिति इस कार्य को देखेगी और सभी के परामर्श से मंदिर को भव्य रूप देने का प्रयास करेगी ।वर्तमान पुजारी श्री तरूणमोहन घिल्डियाल ने कहा के मंदिर को इस तरह से बनाया जाएगा कि भक्तों को माता के दर्शन करने में किसी भी प्रकार की दिक्कत ना हो। मंदिर में लोगों के रहने ,कथा वाचन करने ,भजन करने इत्यादि की भी व्यवस्था की जाएगी । इसके लिए जन सहयोग की आवश्यकता है जोकि माता की कृपा से निरंतर प्राप्त हो रहा है ।पवित भजनों में वर्णित दुर्गा की महिमा से सुशोभित यह मंदिर भक्तों के लिए सदैव खुला रहता है। एक बार अवश्य इस मंदिर में आकर अपनी मनोकामना मां से कहिए और पूरा होने का आनंद लीजिए ।


Posted on 2022-09-03

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