देवप्रयाग से कमलेश्वर तक — आस्था, आत्मीयता और अलकनंदा की अनुगूंज


हरिद्वार से श्रीनगर की एक यात्रा, जो विवाह से आरंभ होकर अध्यात्म में विलीन हो गई


स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़ की लेखनी से विस्तृत यात्रा-वृत्तांत


भूमिका : एक निमंत्रण, जो नियति बन गया

24 फरवरी 2026।

हरिद्वार की उस दोपहर में कुछ भी असाधारण प्रतीत नहीं हो रहा था। गंगा तट पर सामान्य चहल-पहल थी, बाजारों में रौनक थी, और जीवन अपनी स्वाभाविक गति से बह रहा था। परंतु मनुष्य को कहाँ ज्ञात होता है कि कौन-सा क्षण उसके जीवन की स्मृतियों में स्थायी रूप से अंकित हो जाएगा।

सुबह लगभग दस बजे मेरे परम स्नेही मित्र भगवती प्रसाद पंत का फोन आया। उनका स्वर सामान्य था, किंतु उसमें एक आत्मीय आग्रह था—

“भाई साहब, आज 12 बजे श्रीनगर चलना है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के फ्लावर प्वाइंट पर मिलते हैं।”

मैंने बिना अधिक सोचे कहा चलो भाई सहाब। अवसर था— हमारे प्रिय मित्र महेश घिल्डियाल जी की सुपुत्री राशि घिल्डियाल के विवाह का। मन में सहज विचार था— विवाह में सम्मिलित होंगे, शुभकामनाएँ देंगे, रात्रि तक लौट आएँगे। परंतु यह यात्रा केवल सामाजिक दायित्व निभाने की यात्रा नहीं थी। यह तो एक ऐसा पथ बन गया, जिसने इतिहास, पुराण, प्रकृति, संवेदना और आध्यात्मिक अनुभूति को एक सूत्र में बाँध दिया।



हरिद्वार से ऋषिकेश : यात्रा का प्रारंभ

हम समय पर मिले और वाहन ने धीरे-धीरे हरिद्वार की सीमाएँ पार कीं। गंगा की धारा साथ-साथ बहती रही, मानो वह भी इस यात्रा की साक्षी बनना चाहती हो। ऋषिकेश की ओर बढ़ते हुए पहाड़ों की छाया स्पष्ट होने लगी। समतल भूमि से पर्वतीय अंचल में प्रवेश का यह संक्रमण सदा ही मन में उत्साह जगाता है।

ऋषिकेश पार करते समय मैंने सोचा— यह वही भूमि है जहाँ से चारधाम यात्रा का आध्यात्मिक द्वार खुलता है। यहाँ से आगे बढ़ना केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक मानसिक और आध्यात्मिक आरोहण है।

ब्यासि, कौड़ियाला, शिवपुरी— ये स्थान केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि गंगा की उन्मुक्तता के प्रतीक हैं। चट्टानों से टकराती जलधारा, ऊँचाई से गिरती धूप, और दूर-दूर तक फैली हरियाली— मन को निर्मल कर देती है।

पंत जी के साथ बातचीत का सिलसिला चलता रहा। वे केवल मित्र ही नहीं, बल्कि परंपरा और लोककथाओं के जीवंत भंडार हैं। उनकी वाणी में अनुभव है, और अनुभव में श्रद्धा।



देवप्रयाग : जहाँ दो नदियाँ नहीं, दो धाराएँ मिलती हैं

कुछ घंटों की यात्रा के बाद हम पहुँचे उस पवित्र स्थल पर, जिसे सनातन परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है—

देवप्रयाग

जैसे ही वाहन रुका, पंत जी ने गंभीर स्वर में कहा—

“भाई साहब, यह केवल संगम नहीं है। यह तप, त्याग और प्रायश्चित की भूमि है।”

सामने दृश्य अद्भुत था। एक ओर गहरे हरे रंग की अलकनंदा, दूसरी ओर कुछ अधिक तीव्र, कुछ अधिक चंचल भागीरथी। दोनों अलग-अलग रंग, अलग-अलग स्वभाव— किंतु संगम बिंदु पर एकाकार होकर ‘गंगा’ बन जाती हैं।

यह मिलन केवल जल का नहीं, दर्शन का है। अलकनंदा— जो बदरीनाथ की तपस्थली से आती है। भागीरथी— जो गंगोत्री की हिमधाराओं से उतरती है। दोनों मिलकर मानव सभ्यता की धारा बन जाती हैं।

संगम तट पर स्थित है प्राचीन राम मंदिर देवप्रयाग

लोककथा के अनुसार, लंका विजय के पश्चात जब भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया, तब उन्हें ब्रह्महत्या का दोष लगा। उस पाप से मुक्ति के लिए वे इसी संगम के मध्य स्थित शिला पर बैठे और कठोर तप किया। वही शिला आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है।

पंत जी ने कहा—

“तीर्थ में पाप करने से वज्र पाप लगता है, परंतु सच्चे मन से प्रायश्चित करने पर देवप्रयाग मुक्ति का द्वार खोल देता है।”

मैंने उस संगम को निहारते हुए अनुभव किया— मनुष्य के भीतर भी दो धाराएँ बहती हैं। एक अहंकार की, दूसरी आत्मचेतना की। जब दोनों मिलती हैं, तब जीवन ‘गंगा’ बनता है।



प्रकृति, पुराण और वर्तमान का संवाद

देवप्रयाग केवल धार्मिक स्थल नहीं; यह भूगोल, इतिहास और आध्यात्म का अद्भुत संगम है। यहाँ खड़े होकर आप हिमालय की स्थिरता और जलधारा की गतिशीलता दोनों का अनुभव करते हैं।

यहाँ की सीढ़ियाँ केवल पत्थर नहीं, पीढ़ियों की आस्था से घिसी हुई स्मृतियाँ हैं। यहाँ की हवाओं में मंत्रों की अनुगूंज है। यहाँ का प्रत्येक कण कहता है— जीवन परिवर्तनशील है, पर मूल सत्य शाश्वत है।

कुछ देर संगम तट पर रुककर हमने आगे की यात्रा आरंभ की। मन पहले से अधिक शांत था।



श्रीनगर की ओर : अलकनंदा के साथ-साथ

देवप्रयाग से आगे की सड़क अलकनंदा के साथ-साथ चलती है। कभी वह दाईं ओर बहती दिखाई देती, कभी बाईं ओर। पहाड़ों की गोद में लिपटी यह नदी मानो हमें मार्ग दिखा रही थी।

पर्वतीय गाँव, खेतों की सीढ़ियाँ, दूर-दूर तक फैले देवदार— सब मिलकर एक जीवंत चित्र बनाते हैं। यह वही धरती है जिसने अनगिनत लोककथाएँ, लोकगीत और लोकनायक जन्म दिए हैं।



श्रीनगर : कमलेश्वर की नगरी

सांध्य बेला तक हम पहुँचे श्रीनगर गढ़वाल। विवाह स्थल पहुचने के बाद हमने निर्णय लिया— पहले भगवान के दर्शन।

हम पहुँचे प्राचीन धाम—

कमलेश्वर महादेव मंदिर

कहा जाता है कि यहाँ भगवान राम ने सहस्र कमलों से शिव की पूजा की थी। जब एक कमल कम पड़ गया, तो उन्होंने अपना नेत्र अर्पित करने का संकल्प किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया।

जब हम मंदिर पहुँचे, आरती अभी-अभी संपन्न हुई थी। घंटियों की ध्वनि मंद हो चुकी थी, पर वातावरण में मंत्रों की तरंगें शेष थीं। दीपों की लौ हिल रही थी, धूप की सुगंध हवा में तैर रही थी।

शिवलिंग के समक्ष खड़े होकर मैंने केवल एक प्रार्थना की—

“हे महादेव, सबका मंगल हो।”

पुजारी जी से पंत जी का आत्मीय परिचय था। हमें विशेष घृत प्रसाद प्राप्त हुआ— जो अनंत चतुर्दशी के दिन अर्पित कर सुरक्षित रखा जाता है। छोटी-सी  डिब्बी हाथ में थी, पर अनुभूति विराट।

उस क्षण लगा— प्रसाद केवल वस्तु नहीं, विश्वास है।



विवाह : परंपरा और आधुनिकता का समागम

विवाह स्थल रोशनी से जगमगा रहा था। पारंपरिक बैंड की धुन, आतिथ्य की गरिमा, और पहाड़ी संस्कृति की सादगी— सब एक साथ उपस्थित थे।

दूल्हा बग्गी पर सवार होकर आया। मुस्कान में संकोच भी था और उल्लास भी। कुछ ही देर में मंच पर आई राशि— सादगी और संस्कार का अद्भुत संगम।

जयमाला के समय फूलों की वर्षा हुई। परिजनों की आँखों में खुशी थी। हर चेहरे पर आशीर्वाद था।

सुबह सात फेरों के समय जब राशि ने मुझे देखा और पूछा—

“अंकल, घर में सब कुशल हैं?”

उसकी वह सहज आत्मीयता हृदय में बस गई। विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो परिवारों का मिलन है— यह बात उस क्षण पूर्णतः स्पष्ट हुई।



गुरु मां से भेंट : शब्दों की साधना

अगले दिन पंत जी मुझे अपनी गुरु मां से मिलाने ले गए—

प्रो. मृदुला जुगरान

घर में प्रवेश करते ही सादगी और शांति का अनुभव हुआ। तुलसी का पौधा, व्यवस्थित पुस्तकालय, और वातावरण में एक सूक्ष्म गंभीरता।

उन्होंने स्नेहपूर्वक बैठाया। उनकी वाणी में मधुरता और विचारों में गहराई थी। उन्होंने अपनी पुस्तक दिखाई—

मैं नंदा अब बोल पड़ी

उस पुस्तक की कविताएँ केवल साहित्य नहीं, चेतावनी थीं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ पर उन्होंने जो भाव व्यक्त किए थे, वे 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद भविष्यवाणी से प्रतीत हुए।

उन्होंने कहा—

“प्रकृति माता है। उससे संघर्ष नहीं, संवाद करना चाहिए।”

उनके शब्दों ने मुझे भीतर तक स्पर्श किया। मैंने अनुभव किया— ज्ञान का सान्निध्य भी तीर्थ के समान होता है।



उत्तराखंड : केवल भूगोल नहीं, भावभूमि

इस पूरी यात्रा ने मुझे यह समझाया कि उत्तराखंड केवल पहाड़ों का प्रदेश नहीं। यह तप की भूमि है। यहाँ हर नदी कथा कहती है। हर मंदिर इतिहास की धड़कन है। हर गाँव में लोकगीत है।

देवप्रयाग ने सिखाया— मिलन में शक्ति है।

कमलेश्वर ने सिखाया— भक्ति में समर्पण है।

विवाह ने सिखाया— जीवन संबंधों से महकता है।

गुरु मां ने सिखाया— शब्द भी साधना हैं।



आत्ममंथन : यात्रा का वास्तविक अर्थ

लौटते समय वाहन में मौन अधिक था। शायद हम दोनों अपने-अपने विचारों में डूबे थे। अलकनंदा साथ बह रही थी— जैसे कह रही हो, “बहते रहो, रुकना मत।”

मैंने सोचा— जीवन भी यात्रा है। हम सब किसी न किसी संगम की ओर बढ़ रहे हैं। कभी अहंकार और विनम्रता का संगम, कभी संघर्ष और समर्पण का।

देवप्रयाग से श्रीनगर तक की यह यात्रा मेरे लिए एक जीवंत उपनिषद बन गई। यहाँ प्रकृति गुरु थी, अनुभव शास्त्र था, और संवाद साधना।



समापन : एक संकल्प

मैं हरिद्वार लौटा, पर मन का एक भाग अभी भी उस संगम तट पर बैठा है। एक भाग कमलेश्वर के शिवलिंग के समक्ष खड़ा है। एक भाग गुरु मां की वाणी सुन रहा है।

मैंने संकल्प लिया है— इन कथाओं को लिखूंगा, इन अनुभूतियों को साझा करूंगा। क्योंकि यह केवल व्यक्तिगत स्मृति नहीं; यह हमारी सांस्कृतिक चेतना की धरोहर है।

देवप्रयाग से कमलेश्वर तक की यह यात्रा मुझे यह सिखा गई—  जीवन तब पूर्ण होता है, जब उसमें आस्था हो, आत्मीयता हो, और आत्मचिंतन हो।

— स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़