हर की पौड़ी पर ‘अहिंदू प्रवेश निषेध’ बोर्ड से उठा बड़ा सवाल

हर की पौड़ी पर ‘अहिंदू प्रवेश निषेध’ बोर्ड से उठा बड़ा सवाल
कानून का चयनात्मक पालन या तीर्थ की पवित्रता से खिलवाड़?

हरिद्वार।विश्व विख्यात हर की पौड़ी एक बार फिर विवाद के केंद्र में है। श्री गंगा सभा द्वारा हर की पौड़ी क्षेत्र में “हिंदू प्रवेश निषेध” संबंधी बोर्ड लगाए जाने के बाद कानून, आस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारी को लेकर कई तीखे सवाल खड़े हो गए हैं।बोर्ड पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है
— “अहिंदू प्रवेश निषेध क्षेत्र, आज्ञा से म्यूनिसिपल एक्ट”।

गंगा सभा का तर्क: नगर निगम के कानून का प्रचार
श्री गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम का कहना है कि
“हम नगर निगम के पुराने कानूनों का पालन और प्रचार कर रहे हैं, ताकि मां गंगा की मान-मर्यादा, तीर्थ की पवित्रता और मर्यादा बनी रहे।”
उनके अनुसार यह बोर्ड किसी नए नियम की घोषणा नहीं, बल्कि पहले से लागू कानून को दर्शाने के लिए लगाए गए हैं।

नगर निगम का रुख: बोर्ड हमने नहीं लगाए
जब इस विषय में नगर आयुक्त नंदन कुमार से बात की गई तो उन्होंने साफ कहा—
“यह बोर्ड नगर निगम द्वारा नहीं लगाए गए हैं। हम अंग्रेजी शासनकाल की नगर पालिका कानून पुस्तिका का गहन अध्ययन कर रहे हैं। उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा।”
यह बयान अपने आप में गंभीर है, क्योंकि इससे यह स्वीकार होता है कि आज भी 1916 के बने नियम नगर निगम क्षेत्र में लागू हैं।

1916 का कानून: 512 पन्नों की ‘कानूनी किताब’, आज भी लागू
बहुत कम लोगों को पता है कि हरिद्वार नगर निगम आज भी अंग्रेजों के जमाने की 512 पन्नों की नगर पालिका नियमावली से संचालित हो रहा है।
इस कानून में हर की पौड़ी और कनखल के घाटों को लेकर अत्यंत सख्त और स्पष्ट नियम दर्ज हैं, जिनका रोजाना खुलेआम उल्लंघन हो रहा है—और हैरानी की बात यह कि स्वयं नगर निगम और प्रशासन भी।

हर की पौड़ी के सख्त नियम: जो कागजों में जिंदा, जमीन पर मृत
नगर पालिका अधिनियम 1916 की नियमावली के पृष्ठ संख्या 268 पर हर की पौड़ी, संभूति खंड, दीपाकार प्लेटफॉर्म, कुशाव्रत घाट एवं कनखल के घाटों की पवित्रता, मर्यादा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने हेतु कुल 20 सख्त उपनियम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। ये नियम आज भी कानूनी रूप से लागू हैं, किंतु व्यवहार में लगभग निष्क्रिय हो चुके हैं—
- हर की पौड़ी एवं जम्मू घाट पर किसी भी व्यक्ति द्वारा कपड़े सुखाना पूर्णतः प्रतिबंधित है।
- किसी भी पशु को संभूति खंड या घाट क्षेत्र में लाना, रखना या बांधना वर्जित है।
- समभूमिखंड व घाटों पर किसी भी प्रकार की आग जलाने की सख्त मनाही है।
- समभूमिखंड में केवल सनातन धर्म से संबंधित प्रवचन ही हो सकते हैं, वह भी केवल गंगा सभा अध्यक्ष की पूर्व अनुमति से।
- टापू वाले प्लेटफॉर्म पर भाषण, संगीत गोष्ठी या ऐसा कोई कार्य जिससे भीड़ एकत्र हो—पूजा-पाठ के अतिरिक्त—पूरी तरह प्रतिबंधित है।
- हर की पौड़ी क्षेत्र, टापू प्लेटफॉर्म, गऊघाट, कांगड़ा मंदिर से कुशाव्रत घाट तथा कनखल के सतीघाट, राजघाट, लालघाट, पटियाला घाट और दक्ष घाट पर साबुन लगाकर स्नान या कपड़े धोना सख्त मना है।
- समभूमिखंड पर फेरी लगाकर किसी भी प्रकार की वस्तुएं बेचना प्रतिबंधित है।
- किसी भी विक्रेता को निर्धारित स्थान के अतिरिक्त कहीं भी बैठकर बिक्री, विज्ञापन, मुफ्त वितरण या वस्तु प्रदर्शन की अनुमति नहीं है।
- नाई को भी निर्धारित स्थान के अलावा कहीं और संचालन या ठहराव की अनुमति नहीं है।
- नाईसोते के उत्तर में भिक्षा मांगना वर्जित है तथा किसी भिखारी को प्लेटफॉर्म पर घूमने या निर्धारित स्थान के अलावा बैठने की अनुमति नहीं है।
- संसमभूमिखंड की ओर बने किसी भी कमरे या बरामदे का उपयोग सामान जमा करने, बनाने या बेचने के लिए नहीं किया जा सकता।
- दान एकत्र करने के लिए केवल गंगा सभा, पिंजरा पोल और गौशाला की अधिकृत गोलकों के अतिरिक्त किसी अन्य दानपात्र की अनुमति नहीं है।
- संसमभूमिखंड पर किसी कोढ़ी (रोगी) को घूमने या बैठने की अनुमति नहीं है।
- प्लेटफॉर्म पर किसी भी प्रकार का कैंप, टेंट, अस्थायी आश्रय बनाना, निवास करना या दान हेतु देवी-देवताओं की मूर्ति, चित्र या फोटो दिखाना प्रतिबंधित है।
- स्वीकृत टाट या चटाई के अतिरिक्त किसी को भी बेंच, चारपाई, चटाई, अंगीठी या ऐसा कोई साधन रखने की अनुमति नहीं है, जिससे यात्रियों को बाधा, कष्ट या सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा हो।
- प्लेटफॉर्म पर साइकिल चलाना, पैराम्बुलेटर या किसी भी पहिएदार साधन का ले जाना पूर्णतः वर्जित है।
- पालिका अध्यक्ष की लिखित अनुमति के बिना हर की पौड़ी, कुंड या पुल की फोटोग्राफी करना प्रतिबंधित है।
- हर की पौड़ी एवं कनखल के दक्ष घाट पर जूते, बूट या लकड़ी की खड़ाऊ पहनकर प्रवेश करना निषिद्ध है।
- कनखल के सतीघाट के अतिरिक्त किसी अन्य घाट या स्थान पर मृत शरीर की राख गंगा में प्रवाहित करना प्रतिबंधित है।
- तथा निर्धारित अधिकारियों को छोड़कर हर की पौड़ी, दीपाकार प्लेटफॉर्म, संसमभूमिखंड और कुशाव्रत घाट क्षेत्र में अहिंदुओं का प्रवेश वर्जित है।
यही वे 20 नियम हैं, जो 1916 में मां गंगा की पवित्रता, तीर्थ की गरिमा और श्रद्धालुओं की व्यवस्था बनाए रखने के लिए बनाए गए थे, लेकिन आज
👉 कागजों में जीवित
👉 और ज़मीन पर लगभग मृत
इन नियमों को समझना, मानना और लागू कराना ही मां गंगा की सच्ची सेवा है—
सिर्फ बोर्ड लगाने से नहीं, सख्त और समान कानून पालन से। सबसे बड़ा सवाल: सिर्फ एक नियम का बोर्ड क्यों?
यदि गंगा सभा वास्तव में कानून और पवित्रता की पक्षधर है, तो फिर
👉 बाकी 20 नियमों के बोर्ड कहां हैं?
👉 दुकानें, होटल, धर्मशालाएं गंगा की ओर मुंह करके कैसे चल रही हैं?
👉 खुलेआम विक्रय, भिक्षावृत्ति, साबुन से स्नान क्यों जारी है?
केवल “अहिंदू प्रवेश निषेध” का बोर्ड लगाकर क्या मां गंगा की मर्यादा बच जाएगी?
₹10 का जुर्माना आज के समय में मज़ाक!
1916 में जब यह कानून बना, तब ₹10 का जुर्माना बहुत बड़ी सजा मानी जाती थी।आज जब सोने का भाव ₹1,40,000 प्रति तोला है, तब वही जुर्माना मजाक बन चुका है।👉 जरूरत है जुर्माने को हजारों में तय करने की👉 अधिकारी हो या आम आदमी—नियम तोड़ने पर सख्त कार्रवाई की
तीर्थ किसी एक संस्था की जागीर नहीं
हर की पौड़ी
- न गंगा सभा की निजी संपत्ति है
- न नगर निगम की जागीर
- न ही स्थानीय लोगों की बपौती
यह हर उस हिंदु व्यक्ति का तीर्थ है जो मां गंगा से प्रेम करता है।
निष्कर्ष: पवित्रता बोर्ड से नहीं, ईमानदार पालन से बचेगी
मां गंगा की मान-मर्यादा और पवित्रता
👉 चयनात्मक नियमों से नहीं
👉 सख्त, समान और निष्पक्ष कानून पालन से बचेगी
यदि प्रशासन, नगर निगम और धार्मिक संस्थाएं सिर्फ एक नियम नहीं बल्कि पूरे कानून को लागू करें, तभी हर की पौड़ी सच में पवित्र रह पाएगी।
✍️ स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़