
✍️ स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़ की कलम से
राष्ट्रपति तक पहुंची पीड़ितों की पुकार — बहुजन क्रांति मोर्चा ने उठाई देश को झकझोर देने वाली आवाज़
अंकिता भंडारी से लेकर सोनू कश्यप तक, जघन्य अपराधों पर न्याय की हुंकार
हरिद्वार।
देश के अलग-अलग हिस्सों में घटित हो रही अत्यंत गंभीर, अमानवीय और लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली घटनाओं के खिलाफ अब आवाज़ सीधे राष्ट्रपति भवन तक पहुंच चुकी है।
उत्तराखंड से संचालित बहुजन क्रांति मोर्चा ने महामहिम राष्ट्रपति को एक कड़ा ज्ञापन सौंपकर देश को हिला देने वाले अपराधों में दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
यह ज्ञापन हरिद्वार से भेजा गया है, जिस पर संगठन के प्रदेश संयोजक भंवर सिंह सहित कई पदाधिकारियों के हस्ताक्षर हैं।
देश को हिला देने वाली घटनाएं, जिन पर उठी न्याय की मांग
ज्ञापन में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, वे केवल अपराध नहीं —
सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा हैं।
🔴 मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) में छात्र फरहाद अली को पेट्रोल डालकर जिंदा जलाना
🔴 अमरोहा में पेशकार साशिद को उसकी पत्नी और बच्चों के सामने पीट-पीटकर मार देना
🔴 कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में सिराज पर धारदार हथियारों से हमला कर वीडियो बनाना
🔴 मुजफ्फरनगर में युवक सोनू कश्यप को पीट-पीटकर जिंदा जलाना
🔴 मेरठ में दलित महिला की हत्या और उसकी बेटी का अपहरण
🔴 उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी के हत्यारों पर कार्रवाई की मांग
इन सभी मामलों में
दोषियों पर कठोरतम कार्रवाई और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की गई है।
“अमन शांति में ज़हर घोलने वालों पर तुरंत कार्रवाई हो”
ज्ञापन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के सार्वजनिक बयानों का हवाला देते हुए कहा गया है कि
देश में कुछ लोग संविधान और सामाजिक सौहार्द के विरुद्ध जहर घोलने का काम कर रहे हैं,
जिससे लगातार हिंसा भड़क रही है।
बहुजन क्रांति मोर्चा ने मांग की है कि
ऐसे संविधान विरोधी और जनहित विरोधी तत्वों के खिलाफ तुरंत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
“संगठन को अवगत कराया जाए”
मोर्चा ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि
इन मामलों में की गई कार्रवाई से
संगठन को भी अवगत कराया जाए
ताकि देश को भरोसा मिल सके कि
न्याय जिंदा है।
हरिद्वार से उठा न्याय का बिगुल
हरिद्वार की धरती से भेजा गया यह ज्ञापन
सिर्फ एक पत्र नहीं —
यह उन लाखों पीड़ितों की चीख है
जो इंसाफ़ के लिए तरस रहे हैं।
अब सवाल यह है—
क्या सत्ता इस पुकार को सुनेगी
या फिर पीड़ितों की आवाज़
कागजों में ही दबा दी जाएगी?
देश टकटकी लगाए देख रहा है।