
शांतिकुंज शताब्दी समारोह : आध्यात्मिक भूमि पर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन या राष्ट्र चेतना का उत्सव?
हरिद्वार | शांतिकुंज | विशेष रिपोर्ट
स्वतंत्र पत्रकार – रामेश्वर गौड़
“भारत माता की जय” के उद्घोष से गूंजा शांतिकुंज, गृहमंत्री अमित शाह का विराट संबोधन
हरिद्वार स्थित गायत्री परिवार के शांतिकुंज में आयोजित शताब्दी समारोह के अवसर पर देश के गृहमंत्री अमित शाह ने लाखों श्रद्धालुओं को संबोधित किया। अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए उन्होंने उपस्थित भक्तों से दोनों हाथ उठाकर पूरे तन-मन से ‘भारत माता की जय’ का जयघोष कराया।उन्होंने मंच पर उपस्थितगायत्री परिवार के दलनायक डॉ. चिन्मय पंड्या,हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल,उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी,भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट,वरिष्ठ नेता मदन कौशिक,
उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंहसहित देश–विदेश से जुड़े गायत्री परिवार के करोड़ों अनुयायियों को नमन किया।
“देवभूमि उत्तराखंड की धरती पर कदम रखते ही हजारों वर्षों की तपस्या की ऊर्जा का अनुभव होता है” – अमित शाह
गृहमंत्री ने कहा कि
“हरिद्वार केवल एक नगर नहीं, यह सप्तर्षियों की तपोभूमि है, कुंभ की भूमि है, आत्मा को जागृत करने वाली चेतना की भूमि है।”उन्होंने पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य और वंदनीय माता भगवती देवी को नमन करते हुए कहा कि
“इस भूमि से गायत्री चेतना का जो प्रकाश फैला, उसने भारत ही नहीं बल्कि विश्व को आध्यात्मिक ऊर्जा दी।”
गायत्री परिवार : भक्ति को मंदिर की दीवारों से निकालकर जन–जन की आत्मा तक पहुंचाने का आंदोलन
अमित शाह ने कहा कि
गायत्री परिवार का कार्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण और राष्ट्र निर्माण का अभियान है।उन्होंने कहा—
“हम बदलेंगे तो युग बदलेगा — यह केवल नारा नहीं, यह भारत के पुनर्जागरण का सूत्र है।”
उन्होंने बताया कि100 से अधिक देशों में 15 करोड़ से ज्यादा अनुयायी आज गायत्री मंत्र के माध्यम से आत्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं।
गायत्री मंत्र : सनातन परंपरा का वैज्ञानिक अध्यात्म
गृहमंत्री ने विस्तार से गायत्री मंत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि गायत्री मंत्र के 24 अक्षर मानव शरीर की 24 ग्रंथियों को जागृत करते हैं, जो तप, दान, वीरता, धैर्य, तेज और सद्गुणों को विकसित करते हैं।
उन्होंने कहा—
“गायत्री मंत्र किसी एक जाति, वर्ग या लिंग का नहीं, बल्कि समस्त मानवता के कल्याण का मंत्र है।”
लेकिन बड़ा सवाल : धार्मिक समारोह में धर्म कहां था?
यहीं से यह भव्य आयोजन एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—
क्या शांतिकुंज का शताब्दी समारोह आध्यात्मिक संवाद का मंच था या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का?
जहां शंकराचार्य, संत, समाजसेवी और पर्यावरण विशेषज्ञ होने चाहिए थे, वहां केवल सत्ता के चेहरे क्यों?
यह एक कटु सत्य है कि—
- शंकराचार्य,
- धर्माचार्य,
- समाज सुधारक,
- पर्यावरण विशेषज्ञ,
- वैदिक विद्वान
👉 इस मंच से नदारद रहे।
जबकि यही वे लोग हैं जो बता सकते थे—
- धर्म का वर्तमान संकट क्या है?
- समाज किस दिशा में जा रहा है?
- सनातन संस्कृति को बचाने का वास्तविक मार्ग क्या है?
राजनीतिक भाषण हर मंच पर मिल जाते हैं, लेकिन धर्म की गूढ़ चेतना कहां मिले?
आज के दौर में एक खतरनाक “फैशन” बनता जा रहा है—➡️ धार्मिक आयोजनों में सबसे बड़े राजनेता को बुलाकर शक्ति प्रदर्शन करना।➡️ भक्तों के सामने अपनी राजनीतिक उपस्थिति का प्रदर्शन।
लेकिन सवाल यह है—❓ भक्तों को क्या मिला?❓ उन्हें जीवन जीने की नई दिशा मिली या केवल भाषण?
एक ओर शंकराचार्य का अपमान, दूसरी ओर सनातन संरक्षण का दावा!
यह विरोधाभास भी अनदेखा नहीं किया जा सकता—
- उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य को स्नान से रोका जाता है,
- ब्राह्मणों की शिखा पकड़कर अपमान किया जाता है,
- और उसी सत्ता के शीर्ष नेता धार्मिक मंचों पर सनातन के रक्षक बनकर भाषण देते हैं।
❓ क्या यही सनातन संरक्षण है?
धार्मिक संस्थाएं आत्ममंथन करें
यदि शताब्दी समारोह मनाया जा रहा था, तो—✔️ चारों शंकराचार्यों को बुलाया जाना चाहिए था,✔️ धर्म पर गंभीर संवाद होना चाहिए था,✔️ भक्तों को आत्मिक मार्गदर्शन मिलना चाहिए था।केवल यह कहना कि
“आज गृहमंत्री आए, मुख्यमंत्री आए”👉 यह भक्ति नहीं, यह शक्ति प्रदर्शन है।
जहाँ अखंड ज्योति जली, वहाँ सवालों की लौ बुझा दी गई!
धार्मिक समारोह में पत्रकारों को पास नहीं—क्या सवालों से डरती है सत्ता?
जहाँ सवाल थे, वहाँ तालियाँ बजवाई गईं
स्थानीय पत्रकार बाहर, सत्ता अंदर—लोकतंत्र किस ओर जा रहा है?
धर्म के मंच से सवालों का बहिष्कार!
शांतिकुंज में पत्रकारों पर ‘नो एंट्री’—कहीं सत्ता को सनातन पर सवालों का डर तो नहीं?
गौरतलब है कि इस विराट धार्मिक शताब्दी समारोह में स्थानीय और ज़मीनी पत्रकारों को जानबूझकर पास जारी नहीं किए गए। यह कोई प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि सुनियोजित चुप्पी की रणनीति प्रतीत होती है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश के गृहमंत्री को यह आशंका थी कि सनातन धर्म की बड़ी-बड़ी बातों के बीच कहीं कोई पत्रकार उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य के साथ हुई अभद्रता, ब्राह्मणों की शिखा पकड़कर अपमान और सनातन पर हो रहे प्रहारों को लेकर असहज सवाल न पूछ ले?
धर्म के मंच पर जब सत्ता के शीर्ष चेहरे बेझिझक भाषण दे सकते हैं, तो फिर पत्रकारों से डर क्यों?
क्या सनातन अब केवल तालियों और जयकारों तक सीमित रह गया है, और सवाल पूछना अपराध बना दिया गया है?
यह भी विचारणीय है कि जब सनातन, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण की बातें हो रही थीं, तब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को बाहर क्यों रखा गया?
क्या इसलिए कि धर्म की आड़ में राजनीतिक विरोधाभास उजागर न हो जाएँ?
क्या इसलिए कि मंच से सनातन की रक्षा की बात करने वालों से शंकराचार्य अपमान पर जवाब न माँगा जाए?
यदि यह धार्मिक आयोजन था, तो पारदर्शिता से डर क्यों?
और यदि यह शक्ति प्रदर्शन था, तो फिर इसे धर्म का उत्सव क्यों कहा गया?
निष्कर्ष : धर्म को राजनीति से ऊपर रखना होगा
धर्म का उद्देश्य सत्ता की शोभा बढ़ाना नहीं, आत्मा को जागृत करना है। यदि धार्मिक मंच भी केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित रहेंगे, तो भक्ति का स्वरूप धीरे–धीरे खो जाएगा।
धर्म तभी बचेगा जब धर्माचार्य बोलेंगे,
सत्ता नहीं।
✍️ स्वतंत्र पत्रकार
रामेश्वर गौड़