🚨 तीर्थ नगरी हरिद्वार में नियमों का जनाज़ा
नगर निगम खुद बना कानूनों का सबसे बड़ा अपराधी!

गंगा सभा की प्रेस वार्ता से मची खलबली
अध्यक्ष नितिन गौतम ने खोली नगर निगम की पोल

गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम द्वारा की गई प्रेस वार्ता ने तीर्थ नगरी में हलचल मचा दी है। गंगा सभा का स्पष्ट कहना है कि नगर पालिका के नियमों के अनुसार हर की पौड़ी क्षेत्र में अहिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, लेकिन प्रशासन इस नियम को भी सुविधानुसार लागू करता दिखाई दे रहा है।
नगर निगम के अपने ही नियम—खुद ही रौंद रहा निगम

नगर निगम के कानूनों के अनुसार—
- हर की पौड़ी पर गंगा की ओर दुकानों और होटलों का मुंह होना प्रतिबंधित है,
- स्नान घाटों पर किसी भी प्रकार का क्रय-विक्रय पूरी तरह वर्जित है,
लेकिन सच्चाई यह है कि मेला प्राधिकरण स्वयं गंगा की ओर खुली दुकानों के बोर्ड बनवाकर दे रहा है।
यानी कानून बनाने वाला ही कानून तोड़ने वाला बन बैठा है।
हर की पौड़ी ब्रह्मकुंड में खुलेआम प्रतिबंधों का उल्लंघन

नियम साफ कहते हैं कि—
- ब्रह्मकुंड क्षेत्र में चमड़े की वस्तुएं ले जाना प्रतिबंधित है,
लेकिन हकीकत यह है कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी और श्रद्धालु चमड़े की बेल्ट पहनकर खुलेआम ब्रह्मकुंड तक पहुंच रहे हैं।
क्या नियम आम जनता के लिए हैं और अधिकारी उनसे ऊपर हैं?
🌊 एनजीटी के आदेशों की भी उड़ रही धज्जियां

एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने गंगा में—
- धार्मिक सामग्री
- अस्थि विसर्जन
पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, इसके बावजूद इन सभी गतिविधियों पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं।
नगर निगम और प्रशासन मानो एनजीटी के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हों।
🏛️ अंग्रेजों के जमाने का नियम स्तंभ गायब

इतिहास भी सुरक्षित नहीं!
हर की पौड़ी पर लगा अंग्रेज़ों के जमाने का ऐतिहासिक त्रिखंभा, जिस पर तमाम नियम अंकित थे, उसे उखाड़ कर गायब कर दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल—
❓ किसने हटाया?
❓ किसके आदेश से हटाया?
❓ और क्यों हटाया?
क्या नियमों के सबूत ही मिटाए जा रहे हैं?
💰 फूल-प्रसाद के अवैध ठेके—नगर निगम की खुली मिलीभगत

हर की पौड़ी पर—
- फूल-प्रसाद के ठेके,
- घाटों पर अवैध 100 से अधिक ठेके,
खुलेआम लगे हैं और इनके ठेके स्वयं नगर निगम द्वारा दिए गए हैं।
श्रद्धालुओं के लिए बनाए गए निशुल्क तख्तों पर अवैध क्रय-विक्रय हो रहा है, जबकि जिलाधिकारी पहले ही इन्हें हटाने के आदेश दे चुके थे।
करोड़ों खर्च कर फिर वही अवैध व्यवस्था!

अचरज की बात यह है कि जिन अवैध संरचनाओं को हटाने के आदेश हुए, नगर निगम उन्हीं को करोड़ों रुपये खर्च कर दोबारा बनवा रहा है।
यह सुधार है या संगठित भ्रष्टाचार?
⚖️ जब नियमों के रक्षक ही नियम तोड़ें, तो कानून कैसे बचे?

आज स्थिति यह है कि—
- नगर निगम के नियम किताबों में हैं,
- और जमीन पर उन्हीं नियमों की खुलेआम हत्या हो रही है।
यदि नगर निगम के नियम वास्तव में लागू किए गए, तो शहर में बड़ा बवाल खड़ा हो सकता है—शायद यही वजह है कि अधिकारी नियमों को लागू करने से डर रहे हैं या जानबूझकर नहीं कर रहे।
🚨 सख्त कार्रवाई की मांग
भ्रष्ट अधिकारियों पर गिरे कानून का हथौड़ा
अब सवाल यह नहीं कि नियम क्या हैं,
सवाल यह है कि—
👉 क्या नियम सबके लिए समान हैं?
👉 क्या भ्रष्ट अधिकारियों पर कभी कार्रवाई होगी?
जब नियमों का पालन कराने वाले ही नियमों की धज्जियां उड़ाएंगे,
तो कानून और व्यवस्था कैसे बचेगी?
✍️ स्वतंत्र पत्रकार
रामेश्वर गौड़
हरिद्वार