
स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़ की कलम से
हरिद्वार में अतिक्रमण हटाओ अभियान: सवालों के घेरे में प्रशासन, फिर लौट आया अतिक्रमण
रोड़ीबेलवाला से शताब्दी पुल तक अवैध कब्जों की बाढ़, आदेश बन रहे काग़ज़ी कार्रवाई

हरिद्वार | विशेष रिपोर्ट
तीर्थ नगरी हरिद्वार, जिसे धर्म की राजधानी कहा जाता है, आज फिर एक बार अतिक्रमण के कारण सवालों के कठघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। आज अपर रोड पर एक बार फिर अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया गया, लेकिन यह अभियान भी पूर्व की तरह कई गंभीर सवाल छोड़ गया।

जिलाधिकारी के आदेश, फिर भी क्यों लौट आता है अतिक्रमण?
जब जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने हरिद्वार का कार्यभार संभाला था, उसके बाद रोड़ीबेलवाला सहित कई क्षेत्रों को अतिक्रमण मुक्त किया गया था। कुछ समय तक व्यवस्था बनी रही, लेकिन लगभग एक माह बाद फिर वही हालात—
अतिक्रमण हटा, फिर लगा…
फिर हटा, फिर लगा…
और आज स्थिति यह है कि—

रोड़ीबेलवाला से शताब्दी पुल तक पूरा क्षेत्र अतिक्रमण की चपेट में
❓ कौन अधिकारी आंख मूंदे बैठा है?
❓ कौन जेबें भर रहा है?
❓ कौन अवैध दुकानों, फूल फरोशी और प्लास्टिक ठेकों को संरक्षण दे रहा है?
ये सवाल आज श्रद्धालुओं की जुबान पर हैं।

शासनादेश की खुलेआम धज्जियां उड़ती क्यों दिखती हैं?
शासनादेश में स्पष्ट उल्लेख है कि—
अतिक्रमण हटाने के बाद यदि दोबारा कब्जा होता है, तो संबंधित थानाध्यक्ष और चौकी प्रभारी जिम्मेदार होंगे।
तो फिर सवाल उठता है—
ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
अतिक्रमणकारियों पर सख्त कदम क्यों नहीं उठते?

अतिक्रमण के नाम पर बजट, लेकिन परिणाम शून्य!
हर बार अभियान चलता है,
हर बार मशीनें चलती हैं,
हर बार बजट खर्च होता है,
लेकिन स्थायी समाधान शून्य!
क्या अतिक्रमण हटाना केवल औपचारिकता बनकर रह गया है?
क्या यह कमाई का ज़रिया बन चुका है?

तीर्थ की मर्यादा तार-तार, श्रद्धालु शर्मसार
आज स्थिति यह है कि—
गंगा स्नान कर लौटता श्रद्धालु,
जब घाटों से बाहर निकलता है,
तो उसे ऐसा लगता है मानो—
तीर्थ से निकलकर किसी अवैध, गंदे और लूटपाट वाले शहर में आ गया हो।
अवैध पार्किंग,
अवैध दुकानें,
अवैध फूल फरोशी,
प्लास्टिक का खुला व्यापार—
सब कुछ उस तीर्थ पर,
जहां पवित्रता सर्वोपरि होनी चाहिए।
तीर्थ की रक्षा या फिर दिखावटी कार्रवाई?
यह प्रश्न केवल प्रशासन से नहीं,
बल्कि सिस्टम से है।
यदि आज भी सख्त कार्रवाई नहीं हुई,
तो आने वाले समय में—
⚠️ हरिद्वार की धार्मिक पहचान खतरे में होगी
⚠️ तीर्थ की पवित्रता और मर्यादा और अधिक क्षतिग्रस्त होगी
अब देखना यह है कि—
कानून चलेगा या संरक्षण?
शासनादेश प्रभावी होंगे या काग़ज़ों में सिमट जाएंगे?
— स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़