कुंभ 2027 से पहले हरिद्वार में मौत का न्योता बनते गंगा घाट!
✍️ स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़ की कलम से

कुंभ 2027 से पहले हरिद्वार में मौत का न्योता बनते गंगा घाट!
श्रद्धालुओं की जान से खिलवाड़ करता सोता हुआ मेला प्रशासन
हरिद्वार — जिसे धर्म की राजधानी और कुंभ नगरी कहा जाता है, वही हरिद्वार आज अपने सबसे पवित्र स्थलों — गंगा स्नान घाटों पर श्रद्धालुओं की जान के साथ खुलेआम खिलवाड़ का गवाह बन चुका है। कुंभ 2027 को लेकर सरकार गंभीर है, करोड़ों श्रद्धालुओं के स्वागत के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हरिद्वार मेला प्रशासन गहरी नींद में सोया हुआ है।
जहां गंगा का एक-एक घाट करोड़ों आस्थाओं का केंद्र है, वहीं आज वही घाट श्रद्धालुओं के लिए मौत के फंदे बनते जा रहे हैं।

घाटों की सीढ़ियाँ नहीं, मौत की फिसलपट्टियाँ बन चुकी हैं
रोड़ी बेलवाला, पंत दीप, भूतवाला, हर की पौड़ी क्षेत्र के अधिकांश पुराने घाटों पर—
- जंजीरें टूट चुकी हैं
- चैन एंगल गायब या जर्जर हैं
- सीढ़ियों पर पानी की वजह से जबरदस्त फिसलन है
- पकड़ने के लिए कोई सहारा नहीं
जैसे ही कोई श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए उतरता है, पैर फिसलते हैं और वह सीधा गंगा में गिर जाता है।

कई श्रद्धालु चोटिल हो चुके हैं, कई अपनी जान बचाने के लिए गंगा से संघर्ष करते देखे गए हैं, लेकिन मेला प्रशासन की आंखों पर मोटी पट्टी बंधी हुई है।
जहाँ गंगा सूखी — वहाँ घटिया घाट बना दिए,
जहाँ खतरा है — वहाँ मरम्मत तक नहीं!
जब गंगा में पानी कम था, तब आनन-फानन में नए घाटों की नींव रख दी गई — लेकिन घटिया सामग्री और भ्रष्ट निर्माण के कारण उन घाटों में दरारें पड़ चुकी हैं।
और जो पुराने घाट दशकों से श्रद्धालुओं की सेवा कर रहे थे, उन्हें मरम्मत के लिए भी तरसाया जा रहा है। यह कैसी कुंभ तैयारी है?

सर्दी में काम नहीं, भीड़ में बहाने!
इस समय गंगा में जलस्तर कम है, श्रद्धालुओं की संख्या भी अपेक्षाकृत कम है, यही समय मरम्मत का सबसे उपयुक्त समय है।
लेकिन मेला प्रशासन की मानसिकता है—
“अभी क्यों करें? जब भीड़ आएगी तब देखेंगे।”
फरवरी के बाद भीड़ बढ़ेगी, मार्च से कुंभ की आहट तेज होगी, और तब अधिकारी कहेंगे—
“अब काम करना संभव नहीं, भीड़ बहुत है।”
यानी पहले जान जोखिम में डालो, फिर मजबूरी का बहाना बनाओ।
14 जनवरी 2027 – मकर संक्रांति से पहले कौन संभालेगा गंगा की सुरक्षा?
कुंभ का पहला शाही स्नान 14 जनवरी 2027 – मकर संक्रांति को निश्चित है।
करोड़ों श्रद्धालु इन्हीं जर्जर, फिसलन भरे, असुरक्षित घाटों पर स्नान करेंगे।
प्रश्न यह है— क्या कुंभ श्रद्धा का पर्व होगा या प्रशासनिक लापरवाही की बलि चढ़ेगा?
यह सिर्फ लापरवाही नहीं — यह आपराधिक उपेक्षा है
जब—
- खतरा दिख रहा है
- दुर्घटनाएँ हो रही हैं
- संरचनाएँ टूट चुकी हैं
फिर भी मरम्मत नहीं की जा रही — तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह श्रद्धालुओं की जान से किया जा रहा आपराधिक खिलवाड़ है।
क्या कुंभ की तैयारी कागजों में होगी या जमीन पर?
सरकार करोड़ों रुपये स्वीकृत कर रही है, मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र तक कुंभ को लेकर सजग हैं, लेकिन हरिद्वार का मेला प्रशासन
गंगा की सीढ़ियों पर फिसलती जिंदगियों से बेपरवाह है।
आज सवाल है — क्या गंगा के घाट श्रद्धा के होंगे या श्मशान की सीढ़ियाँ बनेंगे?
आने वाला समय बताएगा — कुंभ 2027 आस्था का महापर्व होगा या प्रशासनिक लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण।
— स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़